लोकतंत्र की राह में कमजोर किंतु समझदार आवाजों को सुनना चाहिए  

प्रेम सिंह

मैं पिछले करीब एक महीने से हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में रह रहा हूं। हिमाचल प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से शिमला में रहने वाले कई लोगों से होने वाली सामान्य बातचीत में लोकसभा चुनाव की भी कुछ चर्चा होती रही है। यहां की चार लोकसभा सीटों पर अंतिम चरण में चुनाव होना है। एक दिन भाजपा के पांच-छह कार्यकर्ता समरहिल में मेरे घर पर आए। दरवाजा खोलते ही उनमें वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा ‘हम मोदीजी के लिए . . . ।’ मैंने हंसते हुए उनका स्वागत किया और टोका कि आप शिमला लोकसभा क्षेत्र से अपने उम्मीदवार के बारे में पहले बताइए। नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, उन्हें सभी जानते हैं। पोस्टर पर छपी उम्मीदवार की फ़ोटो की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा ‘हां हां, ये शिमला से हमारे उम्मीदवार हैं।’

मैंने उनसे चुनाव सामग्री लेते हुए कहा कि मेरा वोट यहां नहीं है। मैं आपका पर्चा अवश्य पढ़ूँगा। उन कार्यकर्ताओं से दस-पंद्रह मिनट तक चुनाव-संबंधी बातचीत होती रही। वे जल्दी में नहीं थे। मेरे जिज्ञासा करने पर उन्होंने बताया कि शिमला की सीट पर कांटे की टक्कर है। हमीरपुर और कांगड़ा सीटों पर भाजपा की जीत उन्होंने निश्चित बताई। मंडी शायद कांग्रेस फिर से जीत ले। (2019 के लोकसभा चुनावों में मंडी से भाजपा उम्मीदवार की जीत हुई थी। उनकी मृत्यु के चलते 2021 में हुए मध्यावधि चुनाव में यह सीट कांग्रेस ने जीत ली थी) मैंने पूछा कि मंडी में आपको क्यों लगता है कि वहां कांटे की टक्कर नहीं है? वरिष्ठ कार्यकर्ता ने जवाब दिया कि इस तरह के उम्मीदवार बड़े शहरों में चल जाते हैं। मंडी जैसे छोटे शहर में उनकी दाल गलना मुश्किल है। वे सभी पार्टी के बहुत ही साधारण स्तर के कार्यकर्ता लग रहे थे। पूरी बातचीत में उन्होंने काफी तटस्थता के साथ चुनाव के बारे में अपना आकलन पेश किया। ‘आपके प्रयास के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं’, कह कर मैंने उन्हें विदा किया।

इसके एक दिन पहले कांग्रेस के कार्यकर्ता हमारी कालोनी में आए थे। उनसे मुलाकात नहीं हो सकी थी। वे भूतल पर ही अपनी चुनाव-सामग्री छोड़ कर और कंपाउंड में पोस्टर लगा कर चले गए थे। शायद उन्होंने सोचा हो जैसे भूतल पर घर बंद है, ऊपर की मंजिलों पर भी कोई नहीं होगा। या फिर ऊपर की मंजिलों पर चढ़ने का आलस्य कर गए हों। अगर वे आते तो उनसे भी हिमाचल प्रदेश में चुनाव और राजनीति पर कुछ अंतरंग चर्चा हो जाती। मुझे यह देख कर अच्छा लगा कि हिमाचल में कम से कम शहरों में अभी भी घर-घर जाकर चुनाव-सामग्री बांटने और उम्मीदवार के लिए वोट मांगने का रिवाज कायम है। और यह काम तसल्ली से किया जाता है। यह लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक गतिविधि है।

इस वाकये का जिक्र मैंने इसलिए किया कि भाजपा प्रधानमंत्री मोदी और हाई कमान का वास्ता देकर चुनाव लड़ रही है। भाजपा की ओर से केवल प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष, जो हिमाचल प्रदेश से हैं, की तस्वीरों वाला एक छोटा पोस्टर पूरे प्रदेश में अलग से लगाया गया है। भाजपा उम्मीदवार के लिए वोट की अपील वाले पोस्टर/हैंडबिल पर भी उम्मीदवार की तस्वीर के ऊपर मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की बड़ी तस्वीरें हैं। उनके साथ प्रदेश के कुछ अन्य वरिष्ठ एवं नए नेताओं की छोटे आकार की तस्वीरें हैं।

कांग्रेस, पिछले विधानसभा चुनावों की तरह, लोकसभा चुनावों में भी राज्य स्तरीय नेतृत्व के बूते ही चुनाव मैदान में है। प्रदेश पार्टी संगठन ने कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय घोषणापत्र का सार-संक्षेप और प्रदेश सरकार ने अपने पिछले पंद्रह महीनों के कामों का विवरण चुनाव सामग्री के रूप में वितरित किया है। हाई कमान नेतृत्व की छोटी-छोटी तस्वीरें पोस्टर और पर्चों के शीर्ष पर लगाई गई हैं, जिनमें प्रदेश-प्रभारी और प्रदेश-अध्यक्ष की तस्वीरें भी शामिल हैं। पोस्टर पर मुख्यत: मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खु और उनके साथ उम्मीदवार की तस्वीरें हैं। गरज कि प्रदेश कांग्रेस हाई कमान के नाम पर वोट नहीं मांग रही है। यह एक अच्छा संकेत है। अक्सर पार्टी हाई कमान के नाम पर एक व्यक्ति अथवा परिवार का डिक्टेट चलता है। इससे राजनीति में एक तरफ निरंकुशता और दूसरी तरफ चाटुकारिता की प्रवृत्तियां जड़ जमाती हैं, जो लोकतंत्र के लिए के लिए घातक है। पार्टियों में अगर हाई कमान कल्चर न रहे, तो यह लोकतांत्रिक चेतना, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक संघवाद (फेडरलिज्म) के लिए हितकर स्थिति होगी।

हिमाचल प्रदेश की चुनाव संबंधी रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों ने यह बताया है कि कांग्रेस के लिए यह चुनाव जटिल होने के साथ चुनौतियों से भरा है। हाल में सम्पन्न हुए राज्यसभा चुनावों में सत्तारूढ़ कांग्रेस के छह विधायकों ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन करके पार्टी के मनोनीत उम्मीदवार के खिलाफ भाजपा के उम्मीदवार को वोट दिया था। कांग्रेस ने इसे चुनी हुई सरकार गिराने की भाजपा की साजिश बताया था। हालांकि, यह छिपी बात नहीं है कि हिमाचल प्रदेश के राज्यसभा चुनाव-प्रकरण में कांग्रेस के अंदरूनी सत्ता-संघर्ष की भी भूमिका थी। राज्यसभा के लिए चुने गए भाजपा उम्मीदवार भी करीब डेढ़ साल पहले कांग्रेस से ही भाजपा में आए थे। वे पुराने कांग्रेसी रहे हैं, और पार्टी छोड़ते वक्त प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष थे।

जिन छह विधायकों की विधानसभा सदस्यता रद्द हुई थी, उन सीटों पर लोकसभा चुनाव के साथ ही चुनाव हो रहा है। भाजपा ने उन सभी छह लोगों को भाजपा का टिकट दिया है। यह सर्वविदित है कि मुख्यमंत्री सुक्खु और बागियों के बीच में काफी तीखे आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला रहा है जो चुनावों में और तेज हो गया है। अगर ये बागी उम्मीदवार भाजपा के टिकट पर जीतते हैं तो इससे प्रदेश कांग्रेस के संगठन पर तो बुरा असर पड़ेगा ही, प्रदेश सरकार पर भी संकट आ जाएगा। अगर वे चुनाव हारते हैं तो कांग्रेस संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर मजबूत होगी।

जैसा कि प्रधानममंत्री के मंडी में दिए गए भाषण से लगता है, भाजपा द्वारा प्रदेश की कांग्रेस सरकार को गिराने का खतरा अभी टला नहीं है। अपने को किसी भी राजनीतिक पार्टी से असंबद्ध बताने वाले कई लोगों के अलावा कतिपय भाजपा समर्थकों ने भी सामान्य बातचीत में मुझे कहा कि हिमाचल प्रदेश में लोग चुनी हुई सरकार को गिराने की कोशिश को अच्छी नजर से नहीं देखते। अगर सत्तारूढ़ पार्टी के अपने अंदरूनी झगड़े हैं, तब भी। उनका मानना है कि लोकतंत्र की जो एक स्वस्थ लय हिमाचल प्रदेश में बनी हुई है, वह टूटनी नहीं चाहिए। लोकलुभावन नारों/वादों और अतिरंजित भविष्यवाणियों के तुमुल नाद में इस तरह की समझदार आवाजों को लोकतंत्र के हित में सुना जाना चाहिए।

यह भी गौरतलब है कि कांग्रेस के सभी बागियों को पार्टी का टिकट देने के निर्णय पर भाजपा में स्पष्ट असंतोष है। उनका कहना है कि हिमाचल भाजपा को भी कांग्रेस बनाने की कोशिश की जा रही है। उनके मुताबिक यह तर्क उचित नहीं है कि पहले कांग्रेस का राज्य सरकारों को गिराने का इतिहास रहा है। भाजपा को भाजपा ही रहने देना चाहिए, और कांग्रेस को कांग्रेस। शिमला में मेरे एक लेखक मित्र और एक छोटे व्यावसायी मित्र वर्तमान कांग्रेस हाई कमान को पसंद नहीं करते। फिर भी वे कहते हैं कि राजनीतिक रंगभूमि में कांग्रेस का वजूद बने रहना चाहिए। वैसी ही मान्यता उनकी भाजपा के बारे में है।

नागरिकों की इस तरह की सोच में भारतीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत मिलता है। नवउदारवाद अथवा वित्तीय पूंजीवाद के तीन दशकों के बाद यह एक खुली सच्चाई है कि मुख्यधारा राजनीति से विचारधारा का दाना-पानी लगभग उठ चुका है। यहां तक कि पार्टियों की मुंडेरें भी ध्वस्त होती जा रही हैं। सत्ता के लिए कोई भी नेता किसी भी पार्टी/गठबंधन में आ-जा सकता है। अगर सभी पार्टियों के गंभीर कार्यकर्ता और सजग नागरिक इस प्रवृत्ति का विरोध करने लगें तो राजनीति में विचारधारा की पुनर्बहाली का कुछ रास्ता खुला रह सकता है।

(समाजवादी आंदोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फ़ेलो हैं।)

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