कनागत का शाब्दिक विवेचन

क्वांरमास के प्रथम पखवाड़े के 15 दिन कनागत अर्थात श्राद्धपक्ष के माने जाते हैं। इन 15 दिनों में वैदिक मान्यताओं के अनुसार पितरों को जल अर्पण किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इससे पितर प्रसन्न होते हैं और घर धन-धान्य से भरपूर रहता है;  इस अवधि में होने वाली वर्षा भी कृषि के लिए बहुत उत्तम मानी जाती हैं। कहावत भी है जब बरसेंगे उत्तरा गेहूं खाए ना कुत्तरा।
क्वांर न बरसे भरे न खेत। मात न परसे भरे न पेट।।
यहां हम इस बात पर विचार करते कि कनागत है क्या? लोक मान्यताओं में विप्रों को भोजन करवाना, अन्नदान देना, अन्य प्रकार के पुण्य कार्य करना कनागत में सतत चलता रहता है। एक मान्यता के अनुसार महारथी कर्ण जिनको महादानी कर्ण के नाम से भी पूरा विश्व जानता है;  इनके बारे में कहा जाता है कि प्रतिदिन सवा मन सोना दान देते थे और स्नान करने के उपरांत सूर्य को जल अर्पण करने के बाद उनसे कोई व्यक्ति जो भी मांगता था वह सहर्ष देते थे;  यहां तक कि उन्होंने अपने जीवन रक्षक उपकरण कवच और कुंडल भी दान में दिए थे और स्वयं मृत्यु का मार्ग प्रशस्त कर लिया।
   कहा जाता है अपनी मृत्यु के उपरांत जब कर्ण स्वर्ग लोक पहुंचे तो उनका आदर सत्कार एक महायोद्धा महादानी के रूप में किया गया। पूरी तरह सुसज्जित स्वर्ग लोक में उनको सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध थी किंतु भोजन नहीं था। जब भी वह भोजन की मांग करते उनको सोना परोसा जाता। इस तरह की बातों से व्यथित होकर उन्होंने स्वर्गाधिपति से पूछा कि मुझे भोजन क्यों नहीं दिया जा रहा है? मुझे अन्य से वंचित क्यों रखा जा रहा है? तो स्वर्गाधिपति ने उत्तर दिया,”महादानी कर्ण तुमने अपने जीवन में स्वर्ण दिया है तुमने अन्नदान दिया ही नहीं जब तुमने अन्न दिया ही नहीं तो तुमको मिलेगा कैसे? व्यक्ति जो देता है वही प्राप्त करता है; यह नैसर्गिक सिद्धांत है।” इस बात को सुनकर कर्ण निरुत्तर हो गए। थोड़ी देर बाद उन्होंने पूछा,” इस समस्या का निदान क्या है।”
अधिपति ने कहा,”तुमको 15 दिन के लिए वापस पृथ्वी पर भेजा जाता है; इन पंद्रह दिनों का सदुपयोग किस प्रकार करना है; यह तुम्हारे विवेक पर निर्भर है।” परिणामस्वरूप कर्ण को 15 दिन के लिए पृथ्वी पर वापस भेजा गया। यही 15 दिन कर्ण आगत अर्थात कनागत के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन 15 दिनों में जो दान दिया जाता है वह हमें कालांतर में प्राप्त होता है। कर्ण ने भरपूर दान दिया। लाखों लोगों को भोजन करवाएं और 15 दिन के उपरांत उनको मोक्ष की प्राप्ति हुई। इसलिए 15 वें दिन को सर्वपित्र मोक्ष अमावस्या के नाम से जाना जाता है।

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